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नक्सलवाद पर अंतिम प्रहार तेज

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31 मार्च तक नक्सल मुक्त भारत के लक्ष्य से पहले सुरक्षा बल अंतिम चरण में पहुंच गए हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और तेलंगाना में बड़े सर्च ऑपरेशन, कोबरा कमांडो की अहम भूमिका और बचे नक्सलियों पर फोकस को जानिए विस्तार से।

दिल्ली/रायपुर: देश में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही सबसे बड़ी और निर्णायक लड़ाई अब अंतिम चरण में पहुंचती दिखाई दे रही है। केंद्र सरकार की ओर से तय की गई समयसीमा के मुताबिक 31 मार्च तक नक्सल मुक्त भारत का लक्ष्य रखा गया है, और इस डेडलाइन से पहले सुरक्षा बलों ने अपना दबाव और तेज कर दिया है। हाल के महीनों में नक्सल संगठन को लगातार बड़े झटके लगे हैं। कई शीर्ष कमांडर मारे गए, कई ने आत्मसमर्पण किया और कई इलाकों में संगठन की पकड़ पहले के मुकाबले काफी कमजोर पड़ी है।

सुरक्षा एजेंसियों का आकलन है कि अब नक्सली नेटवर्क पहले जैसा मजबूत नहीं रह गया है। उनके प्रभाव वाले क्षेत्र सीमित हुए हैं और उनके पास न तो पहले जैसी बड़ी कैडर ताकत बची है, न ही बड़े हमलों की वैसी क्षमता दिखाई दे रही है। हालांकि, खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक अभी भी कुछ नक्सली समूह छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और तेलंगाना के दुर्गम जंगलों और सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय या छिपे हुए हो सकते हैं। यही वजह है कि आने वाले घंटे और दिन बेहद अहम माने जा रहे हैं।

नक्सलवाद के खिलाफ अब निर्णायक मोड़

पिछले कुछ वर्षों में नक्सलवाद के खिलाफ केंद्र और राज्यों की संयुक्त रणनीति ने जमीन पर असर दिखाया है। पहले जिन इलाकों में सुरक्षा बलों की आवाजाही तक चुनौती मानी जाती थी, वहां अब लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं। सड़क, संचार, कैंप, ड्रोन निगरानी, खुफिया नेटवर्क और स्थानीय सहयोग के कारण सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ काफी मजबूत हुई है।

इस बार रणनीति सिर्फ मुठभेड़ या दबाव तक सीमित नहीं रही। सरकार ने दो मोर्चों पर एक साथ काम किया—सुरक्षा और विकास। एक ओर जंगलों में ऑपरेशन बढ़ाए गए, तो दूसरी ओर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में सड़क, राशन, शिक्षा, स्वास्थ्य और बैंकिंग जैसी सुविधाएं पहुंचाने की कोशिश तेज हुई। इससे नक्सल संगठनों के लिए स्थानीय समर्थन जुटाना पहले की तुलना में ज्यादा मुश्किल हुआ है।

हाल के महीनों में शीर्ष स्तर के नक्सली नेताओं के मारे जाने या आत्मसमर्पण करने से संगठन की कमान और नेटवर्क दोनों पर असर पड़ा है। यही कारण है कि सुरक्षा एजेंसियां अब इस लड़ाई को अंतिम मोड़ मान रही हैं।

यह भी पढ़ें: छत्तीसगढ़ में नक्सल मोर्चे पर सुरक्षा बलों की बढ़ी पकड़, जंगलों में क्यों बढ़ा दबाव

31 मार्च की समयसीमा और बढ़ती कार्रवाई

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से देश को नक्सलवाद से मुक्त करने के लिए 31 मार्च की समयसीमा तय किए जाने के बाद सुरक्षा एजेंसियों की सक्रियता और तेज हो गई है। अब यह केवल नियमित अभियान नहीं, बल्कि फाइनल फेज ऑपरेशन के रूप में देखा जा रहा है।

सूत्रों के मुताबिक सुरक्षा बलों ने उन इलाकों की पहचान कर ली है, जहां अब भी नक्सली समूहों की हलचल या छिपने की आशंका है। आने वाले 48 घंटे और 72 घंटे को सबसे अहम माना जा रहा है। इसी दौरान बड़े पैमाने पर सर्च, कॉम्बिंग और डोमिनेशन ऑपरेशन चलाए जा सकते हैं।

यह अभियान केवल जंगलों में मुठभेड़ के लिए नहीं, बल्कि नक्सलियों के बचाव, छिपने, सप्लाई और आवाजाही के रास्तों को पूरी तरह तोड़ने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों को उम्मीद है कि दबाव बढ़ने के साथ बचे हुए कई नक्सली आत्मसमर्पण का रास्ता चुन सकते हैं।

100 से 150 बचे नक्सलियों पर फोकस

सुरक्षा एजेंसियों के अंदरूनी आकलन के अनुसार, अब सक्रिय या छिपे हुए नक्सलियों की संख्या काफी सीमित रह गई है। बताया जा रहा है कि इनकी मौजूदगी मुख्य रूप से छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और तेलंगाना के कुछ दुर्गम हिस्सों में हो सकती है। ये वे इलाके हैं, जहां भौगोलिक कठिनाइयों और जंगल के कारण ऑपरेशन चुनौतीपूर्ण बन जाते हैं।

हालांकि, एजेंसियों का कहना है कि बचे हुए नक्सली अब किसी बड़े और संगठित हमले की स्थिति में नहीं हैं। फिर भी वे आईईडी, एंबुश, स्नाइपिंग या छोटे हमलों के जरिए सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं। यही वजह है कि ऑपरेशन के दौरान जवानों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं।

रणनीति साफ है—जो सामने आएं, उन्हें आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित किया जाए; और जो हिंसक रास्ता छोड़ने को तैयार न हों, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

50 हजार जवानों का बड़ा अभियान

इस अंतिम चरण में सुरक्षा बलों की तैनाती और अभियान का पैमाना भी बड़ा है। विभिन्न केंद्रीय अर्धसैनिक बलों, विशेष कमांडो इकाइयों और राज्य पुलिस बलों के हजारों जवान नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात बताए जा रहे हैं। इन अभियानों में जंगल युद्ध का अनुभव रखने वाले जवानों की विशेष भूमिका है।

ऑपरेशन का उद्देश्य केवल मुठभेड़ नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र को क्लियर, होल्ड और डॉमिनेट करना है। यानी पहले इलाके को नक्सल प्रभाव से मुक्त करना, फिर वहां स्थायी सुरक्षा उपस्थिति बनाना और उसके बाद विकास गतिविधियों को तेज करना। यही मॉडल पिछले कुछ वर्षों में कई इलाकों में असरदार साबित हुआ है।

इस बार सुरक्षा बलों के पास आधुनिक उपकरण, संचार व्यवस्था, स्थानीय जानकारी, तकनीकी निगरानी और ड्रोन जैसी क्षमताएं भी हैं, जिससे जंगलों में ऑपरेशन की प्रभावशीलता पहले से बढ़ी है।

यह भी पढ़ें: नक्सल प्रभावित इलाकों में कैसे बदल रही है सुरक्षा और विकास की संयुक्त रणनीति

कोबरा कमांडो की भूमिका क्यों है सबसे अहम?

नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में अगर किसी विशेष बल का नाम सबसे ज्यादा लिया जाता है, तो वह है कोबरा (COBRA)—यानी कमांडो बटालियन फॉर रिजॉल्यूट एक्शन। यह बल खास तौर पर जंगल युद्ध, घातक ऑपरेशन और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में लड़ाई के लिए तैयार किया गया है।

कोबरा कमांडो की सबसे बड़ी ताकत है—तेज मूवमेंट, जंगल में लंबे समय तक टिके रहना, कम संसाधनों में ऑपरेशन चलाना और दुश्मन की रणनीति को उसी के इलाके में मात देना। यही वजह है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में बड़े अभियानों में इनकी भूमिका बेहद अहम मानी जाती है।

इन कमांडो की ट्रेनिंग बेहद कठोर और विशेष होती है। जंगल में लड़ाई, घेराबंदी तोड़ना, ट्रैकिंग, एंबुश से बचाव, नाइट ऑपरेशन और आईईडी से निपटने जैसे कौशल इन्हें सामान्य बलों से अलग बनाते हैं। कई सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि कोबरा जैसी विशेष इकाइयों ने ही नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई की दिशा बदलने में निर्णायक योगदान दिया है।

नक्सलियों की रणनीति अब कैसे बदल गई है?

पहले नक्सली संगठन बड़े समूहों में हमला करते थे, कैंपों पर धावा बोलते थे और लंबी दूरी तक जंगलों में सक्रिय रहते थे। लेकिन अब उनके सामने सुरक्षा बलों की लगातार मौजूदगी, तकनीकी निगरानी और स्थानीय समर्थन में कमी जैसी बड़ी चुनौतियां हैं। यही कारण है कि उनकी रणनीति भी बदली है।

अब वे खुली भिड़ंत की बजाय छिपकर वार, आईईडी ब्लास्ट, सुरक्षा बलों की मूवमेंट पर नजर और छोटे स्तर के नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं। यानी वे कमजोर जरूर हुए हैं, लेकिन पूरी तरह निष्क्रिय मान लेना अभी जल्दबाजी होगी।

सुरक्षा एजेंसियां इसी वजह से ऑपरेशन के दौरान केवल मुठभेड़ पर नहीं, बल्कि माइन डिटेक्शन, रूट सैनिटाइजेशन, लोकल इंटेलिजेंस और गांव-स्तरीय नेटवर्क पर भी बराबर ध्यान दे रही हैं।

गांवों में विश्वास बहाली और खुफिया इनपुट पर जोर

नक्सल प्रभावित इलाकों में सिर्फ बंदूक से जीत हासिल नहीं की जा सकती। यही कारण है कि सुरक्षा बल अब विश्वास बहाली अभियान पर भी जोर दे रहे हैं। जिन गांवों में कभी नक्सलियों का प्रभाव रहा, वहां अब सुरक्षा बल लगातार पहुंच बना रहे हैं। ग्रामीणों से संवाद, मेडिकल कैंप, जनसंपर्क कार्यक्रम और सरकारी योजनाओं की जानकारी देकर यह संदेश दिया जा रहा है कि राज्य अब उनके साथ खड़ा है।

इसका दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है खुफिया जानकारी। जब स्थानीय लोग भरोसा जताने लगते हैं, तो सुरक्षा एजेंसियों को जमीनी इनपुट बेहतर मिलने लगते हैं। यही इनपुट जंगलों में छिपे नक्सलियों, उनके सपोर्ट नेटवर्क और मूवमेंट को समझने में सबसे ज्यादा मदद करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि नक्सलवाद के खिलाफ असली जीत केवल बंदूक की नहीं, बल्कि विश्वास, विकास और सुरक्षा की संयुक्त जीत होगी।

क्या 31 मार्च तक पूरी तरह नक्सल मुक्त भारत संभव है?

यह सवाल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। कागज पर किसी समयसीमा तक “पूर्ण समाप्ति” का दावा करना आसान लगता है, लेकिन जमीनी हकीकत कई बार ज्यादा जटिल होती है। नक्सलवाद जैसे नेटवर्क पूरी तरह खत्म होने के बाद भी उसकी बचे-खुचे मॉड्यूल, स्थानीय संपर्क, सप्लाई लाइन और विचारधारात्मक असर कुछ समय तक बने रह सकते हैं।

इसलिए 31 मार्च की समयसीमा को कई विशेषज्ञ प्रतीकात्मक और रणनीतिक लक्ष्य मानते हैं—यानी इस तारीख तक नक्सलवाद की कमर तोड़ देना, उसकी संचालन क्षमता खत्म कर देना और उसे संगठित खतरे के रूप में लगभग निष्क्रिय कर देना।

अगर सुरक्षा एजेंसियों का दबाव इसी तरह बना रहा, आत्मसमर्पण की प्रक्रिया तेज हुई और विकास कार्य गांव-गांव तक पहुंचे, तो आने वाले महीनों में नक्सलवाद की वापसी की संभावना बेहद कमजोर पड़ सकती है।

निष्कर्ष: अंतिम लड़ाई सिर्फ जंगल में नहीं, जमीन पर भी

देश में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही कार्रवाई अब ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां सुरक्षा बलों को बढ़त मिलती साफ दिखाई दे रही है। लेकिन यह अंतिम जीत केवल जंगल में ऑपरेशन से नहीं, बल्कि स्थायी प्रशासनिक मौजूदगी, स्थानीय विश्वास और विकास से तय होगी।

फिलहाल इतना साफ है कि नक्सल नेटवर्क पर अब तक का सबसे बड़ा दबाव बना हुआ है। बचे हुए नक्सलियों के सामने दो ही रास्ते हैं—आत्मसमर्पण या कार्रवाई। आने वाले कुछ दिन इस लंबे संघर्ष के सबसे निर्णायक दिन साबित हो सकते हैं।

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